॥ अंतरा 1 ॥
तू है सखी बड़ा भाग बड़ी, नंदलाल तेरे घर आवत है री।
निज कर गूंथ सुमन के गजरा, अपने ही हाथ पहरावत है री।
तू अपनों श्रृंगार करता है, दर्पण तोहि दिखावत है री।
तू है सखी बड़ा भाग बड़ी, नंदलाल तेरे घर आवत है रे।
॥ अंतरा 2 ॥
सब कोई इनके गुन न बखानत, पर ये तेरौ गुन गावत है री।
कुंभनदास लाल गिरधर प्रभु, तेरे ही हाथ बिकावत है री॥