॥ अंतरा 1 ॥
डर लागै और हाँसी आवै, अजब जमाना आया रे॥ टेक।
धन दौलत लै माल खजाना, वेश्या नाच नचाया रे।
मुट्ठी भर अन्न साधु कोइ माँगै, कहैं लाज नहिं आया रे॥१॥
॥ अंतरा 2 ॥
कथा होत तहाँ श्रोता सोवै, वक्ता पचाया रे।
होय जहाँ कहीं स्वाँग तमाशा, तनिक न नींद सताया रे॥२॥
॥ अंतरा 3 ॥
भाँग तम्बाखू सुलफा गाँजा, सूखा खूब उड़ाया रे।
गुरु चरणामृत ले न धारे, महुवा चाखन आया रे॥३॥
॥ अंतरा 4 ॥
उलटी चलन चली दुनिया की, ताते जिय घबराया रे।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, फिर पीछे पछताया रे॥४॥