॥ अंतरा 1 ॥
भाग बड़ौ वृन्दावन पायौ।
जा रज कौं सुर नर मुनि वंछित, विधि संकर सिर नायौ॥
॥ अंतरा 2 ॥
बहुतक जुग या रज बिनु बीते, जन्म जन्म डहकायौ।
सो रज अब कृपा करि दीनी, अभै निसान बजायौ॥
॥ अंतरा 3 ॥
आइ मिल्यौ परिवार आपने, हरि हँसि कंठ लगायौ।
स्यामा स्यामा जू बिहरत दोऊ, सखी समाज मिलायौ॥
॥ अंतरा 4 ॥
सोग संताप करौ मति कोई, दाव भलौ बनि आयौ।
श्रीरसिकबिहारी की गति पाई, धनि धनि लोक कहायौ॥