॥ अंतरा 1 ॥
मैं गिरधर के घर जाऊँ।
गिरधर म्हाँरो साँचो प्रीतम
देखत रूप लुभाऊँ॥
॥ अंतरा 2 ॥
रैण पड़ै तब ही उठ जाऊँ
भोर भये उठ आऊँ।
रैण दिना वा के संग खेलूँ
ज्यूँ त्यूँ ताही रिझाऊँ॥
॥ अंतरा 3 ॥
जो पहिरावै सोई पहिरूँ
जो दे सोई खाऊँ।
मेरी उण की प्रीत पुराणी
उण बिन पल न रहाऊँ॥
॥ अंतरा 4 ॥
जहाँ बैठावें तितही बैठूँ
बेचै तो बिक जाऊँ।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर
बार-बार बलि जाऊँ॥