॥ अंतरा 1 ॥
आज दधि मीठो मदन गोपाल।
भावत मोहि तिहारो झूंठो चंचल नैन बिसाल॥
॥ अंतरा 2 ॥
आने पात बनाये दोना दिये सबनको बांट।
जिन नहिं पायो सुनो रे भैया मेरी अंगुरिन चाट॥
॥ अंतरा 3 ॥
बहुत दिनन हम रहे कुमुदवन कृष्ण तिहारे साथ।
ऐसो स्वाद हम कबहु न चाख्यो सुन गोकुल के नाथ॥
॥ अंतरा 4 ॥
आपुन खात खवावत ग्वालन मानस लीला रूप।
परमानंद प्रभु हम सब जानत तुम त्रिभुवन के भूप॥